न्युज नेटवर्क THE राष्ट्र दर्पण रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए निजी धार्मिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण बात कही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दारुल कजा जैसी निजी शरिया संस्थाएं धार्मिक मामलों में अपनी राय दे सकती हैं, लेकिन उन्हें कानून की अदालत के समान अधिकार हासिल नहीं हैं।
अदालत के मुताबिक ऐसी संस्था किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को अपने आदेश से कानूनी तौर पर बदलने या विवाह समाप्त करने का बाध्यकारी फैसला नहीं दे सकती। वैवाहिक स्थिति से जुड़े कानूनी अधिकारों का निर्धारण संबंधित कानून और सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है।
क्या है मामला?
यह मामला रायपुर की एक महिला से जुड़ा था, जिसका वैवाहिक विवाद सामने आने के बाद मामला एक निजी शरिया संस्था तक पहुंचा। संस्था ने वर्ष 2022 में एक आदेश जारी करते हुए महिला को उसके पति से अलग यानी तलाकशुदा घोषित किया था।
महिला ने इस आदेश की कानूनी वैधता को चुनौती दी। मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने यह जांच की कि क्या किसी निजी धार्मिक संस्था को इस तरह किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति पर बाध्यकारी निर्णय लेने का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि निजी शरिया संस्था को न्यायालय की वैधानिक शक्तियां प्राप्त नहीं हैं। वह धार्मिक मामलों में मत या राय रख सकती है, लेकिन उसकी राय को कानूनन बाध्यकारी न्यायिक आदेश नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने संबंधित संस्था द्वारा जारी आदेश को कानूनी प्रभाव से रहित माना। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के विवाह या तलाक से जुड़े कानूनी अधिकारों का फैसला कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय ही कर सकता है।
धार्मिक राय और कानूनी आदेश में अंतर
अदालत की टिप्पणी का अहम पहलू यह है कि धार्मिक संस्था की राय और न्यायालय के कानूनी आदेश को एक समान नहीं माना जा सकता। किसी धार्मिक संस्था की ओर से दी गई राय किसी व्यक्ति के वैधानिक अधिकारों या वैवाहिक स्थिति को अपने आप नहीं बदल देती।
यानी धार्मिक स्तर पर किसी मामले को लेकर राय व्यक्त की जा सकती है, लेकिन उसका कानूनी असर तभी होगा जब वह संबंधित कानून और निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप हो।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला निजी धार्मिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालत ने साफ किया है कि न्यायिक अधिकार केवल उन संस्थाओं को प्राप्त हैं जिन्हें कानून मान्यता देता है।
इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि वैवाहिक विवादों में किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति तय करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।









