बस्तर दशहरा 2026। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान में बस्तर दशहरा का विशेष स्थान है। यह ऐसा पर्व है, जिसकी परंपराएं देश के दूसरे हिस्सों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सवों से अलग हैं। यहां रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता, बल्कि मां दंतेश्वरी के प्रति श्रद्धा और बस्तर की पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप उत्सव मनाया जाता है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह आयोजन जनजातीय संस्कृति, स्थानीय देवी-देवताओं और सामुदायिक सहभागिता का अनूठा उदाहरण हैं।
बस्तर दशहरा समिति, जगदलपुर के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को वर्ष 2026 के आयोजन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। बस्तर के सांसद महेश कश्यप के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने 8 अक्टूबर को रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास कार्यालय में उनसे मुलाकात की। इस अवसर पर बस्तर की परंपरा के अनुसार मुख्यमंत्री को पागा पहनाकर सम्मानित किया गया। मुख्यमंत्री ने निमंत्रण के लिए आभार जताया और आयोजन की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं।
रामायण की कथा से अलग है बस्तर दशहरा की पहचान
भारत में दशहरा आमतौर पर भगवान श्रीराम की विजय और रावण दहन से जुड़ा होता है। बस्तर में इस पर्व का धार्मिक आधार अलग है। यहां मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं और जनजातीय रीति-रिवाज उत्सव के केंद्र में रहते हैं।
इस विशिष्ट स्वरूप के कारण बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक जीवन से जुड़ा उत्सव भी है। इसमें अलग-अलग समुदाय अपनी परंपराओं के अनुसार भाग लेते हैं और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर को आगे बढ़ाते हैं।
पाट जात्रा से शुरू होता है उत्सव का सफर
बस्तर दशहरा की शुरुआत पाट जात्रा की रस्म से होती है। इस अनुष्ठान में पारंपरिक रूप से रथ निर्माण में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी की पूजा की जाती है। इसके साथ उत्सव की धार्मिक प्रक्रियाओं और तैयारियों का सिलसिला शुरू होता है।
इसके बाद निर्धारित परंपराओं के अनुसार अन्य रस्में निभाई जाती हैं। प्रत्येक अनुष्ठान का अपना महत्व है और सभी मिलकर इस लंबे पर्व को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं।
काछनगादी की रस्म क्यों है खास?
बस्तर दशहरा की प्रमुख परंपराओं में काछनगादी का महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्थानीय देवी से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का प्रतीक है। पारंपरिक विश्वास के अनुसार, इस रस्म के माध्यम से देवी की अनुमति प्राप्त करने की परंपरा निभाई जाती है।
इस तरह की रस्में बताती हैं कि बस्तर दशहरा का स्वरूप केवल उत्सव या मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यहां धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी सामुदायिक परंपराएं आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पारंपरिक रथ परिक्रमा में दिखती है सामूहिक भागीदारी
बस्तर दशहरा के दौरान विशाल पारंपरिक रथ से जुड़े आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं। रथ परिक्रमा की रस्मों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी इस पर्व को सामूहिक स्वरूप देती है।
रथ से संबंधित अनुष्ठान उत्सव की परंपरागत व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। इन्हीं आयोजनों के माध्यम से बस्तर की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय समाज का अपनी विरासत से जुड़ाव दिखाई देता है।
मुरिया दरबार भी है पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा
बस्तर दशहरा की परंपराओं में मुरिया दरबार का भी विशेष महत्व है। यह आयोजन जनजातीय समाज की पारंपरिक व्यवस्था और सामुदायिक संवाद से जुड़ा हुआ है। इसमें पारंपरिक प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों की भूमिका रहती है।
मुरिया दरबार बस्तर की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है। यह पर्व के उस पक्ष को सामने लाता है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ समाज की सामूहिक भागीदारी भी शामिल है।
2026 के आयोजन पर टिकी लोगों की नजरें
वर्ष 2026 में भी बस्तर दशहरा अपनी पारंपरिक रस्मों और धार्मिक आयोजनों के साथ मनाया जा रहा है। उत्सव का प्रमुख चरण अक्टूबर में है। पाट जात्रा से शुरू हुई परंपराओं के क्रम में रथ से जुड़े आयोजन और अन्य महत्वपूर्ण अनुष्ठान निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार संपन्न होते हैं।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय को दिया गया आमंत्रण इस वर्ष के आयोजन से जुड़ी महत्वपूर्ण खबर है। हालांकि, आमंत्रण मिलने को मुख्यमंत्री की उपस्थिति की अंतिम पुष्टि नहीं माना जाना चाहिए।
बस्तर दशहरा की खासियत इसकी अवधि से कहीं आगे जाती है। मां दंतेश्वरी के प्रति आस्था, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराएं, पारंपरिक रथ और जनजातीय समाज की भागीदारी इसे छत्तीसगढ़ की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर बनाते हैं। यही कारण है कि यह पर्व आज भी बस्तर की पहचान और गौरव से गहराई से जुड़ा हुआ है।









