रायपुर/जगदलपुर। वन्यप्राणी संरक्षण सप्ताह के तहत बस्तर संभाग में वन्यजीवों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में पहली बार संभाग स्तरीय टाइगर प्रोटेक्शन कार्यशाला आयोजित की जा रही है। वन विद्यालय, जगदलपुर में शुरू हुई यह दो दिवसीय कार्यशाला कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान प्रबंधन की ओर से आयोजित की गई है।
वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन एवं निर्देशानुसार आयोजित इस प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य मैदानी स्तर पर तैनात वनकर्मियों को बाघों की पहचान, उनके व्यवहार और जंगल में मिलने वाले विभिन्न संकेतों की वैज्ञानिक तरीके से पहचान के लिए प्रशिक्षित करना है।

बाघों की पहचान और निगरानी के आधुनिक तरीकों की जानकारी
कार्यशाला के दौरान राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य गौरव निलानी और एसडीओ योगेश रात्रे ने प्रस्तुतीकरण के माध्यम से वनकर्मियों को बाघ संरक्षण और ट्रैकिंग से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी दी।
प्रशिक्षण में बाघ के व्यवहार, रहन-सहन, क्षेत्रीय गतिविधियों और उसके क्षेत्र की पहचान जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। इसके साथ ही बाघ और तेंदुए के पगमार्क में अंतर करने, नर एवं मादा बाघ की पहचान, पगमार्क के पैड इंप्रेशन तथा फोटोग्राफ के आधार पर पहचान की तकनीकों के बारे में भी प्रशिक्षण दिया गया।
वनकर्मियों को बाघ के शिकार से जुड़े संकेत, खरोंच के निशान और क्षेत्रीय मार्किंग की पहचान के साथ-साथ कैमरा ट्रैप और मैदानी निगरानी की आधुनिक तकनीकों से भी अवगत कराया गया। वन्यजीव अपराधों की रोकथाम और सूचना तंत्र को मजबूत करने के उपाय भी प्रशिक्षण का हिस्सा रहे।

पहले दिन परीक्षा, दूसरे दिन जंगल में प्रैक्टिकल
कार्यशाला के पहले दिन प्रतिभागियों को मुख्य रूप से सैद्धांतिक प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद उनकी समझ और जानकारी का आकलन करने के लिए परीक्षा भी आयोजित की गई।
कार्यशाला के दूसरे दिन प्रतिभागियों को फील्ड विजिट और प्रायोगिक अभ्यास कराया गया। इस दौरान वनकर्मियों ने जंगल में जाकर पगमार्क समेत वन्यजीवों की मौजूदगी के विभिन्न संकेतों की पहचान करने का व्यावहारिक प्रशिक्षण लिया।
वरिष्ठ वन अधिकारी रहे मौजूद
कार्यशाला में मुख्य वन संरक्षक (बस्तर) स्टाइलो मंडावी, मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) उत्तम गुप्ता और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के निदेशक गौतम नारायण पड़ीभार सहित वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।
संभाग स्तर पर पहली बार आयोजित इस प्रशिक्षण को बस्तर क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और मैदानी निगरानी की क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण पहल के रूप में देखा जा रहा है।









