भगवान हलधर से जुड़ा हुआ है हल षष्ठी पर्व संतान के सुखी और दीर्घायु जीवन के कामना के लिए माताएं रखती है व्रत

रायपुर/

छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और आस्था से जुड़ा पर्व हरछठ आज दो सितंबर,बुधवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। कृष्ण जन्माष्टमी से दो दिन पहले भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व को देश के अलग-अलग हिस्सों में हल षष्ठी, हरछठ इत्यादि के नाम से जाना जाता है।

 

संतान के सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना के लिए माताएं व्रत रखती हैं और विधि-विधान से षष्ठी माता की पूजा-अर्चना करती हैं।

हल षष्ठी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम से माना जाता है। भगवान बलराम को उनके अस्त्र हल के कारण उन्हें हलधर भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि उनका जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था, इसलिए इस दिन को हल षष्ठी के रूप में मनाया जाता है।

बिना हल चलाकर उगाये अनाज और सब्जियों का विशेष महत्व:-

वैसे छत्तीसगढ़ में हरछठ पर्व के व्रत और पूजा की परंपरा बेहद खास है। महिलाएं हरछठ के दिन व्रत में ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन करती हैं, जिसे बिना हल के जमीन जोताई करके जमीन पर उगाई गई हो।

तालाब और प्राकृतिक रूप से उगने वाले खाद्य पदार्थों को विशेष महत्व दिया जाता है।

पूजा के बाद महिलाएं परंपरागत रूप से पसई चावल का भात और भाजियों का सेवन करती हैं। इस दिन भैंस के दूध, दही और घी के उपयोग की भी परंपरा है।

हलछठ पर्व में 6 अंक का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा के दौरान सगरी में 6-6 बार पानी डाला जाता है। इसके अलावा 6 खिलौने, 6 लाई के दोने , भूने चने , मटर और महुआ इत्यादि को मिलाकर 6 चुकिया (मिट्टी के छोटे घड़े) में भरकर चढ़ाने की परंपरा है।

सगरी बनाकर की जाती है पूजा:-

हल षष्ठी में महिलाएं घरों और मोहल्लों में सगरी, यानी तालाब के स्वरूप की आकृति बनाती हैं। इसमें दूध और दही अर्पित कर पूजा की जाती है। महिलाएं भगवान शिव-पार्वती और षष्ठी माता की आराधना कर अपने बच्चों के स्वस्थ, सुखी और लंबे जीवन की कामना करती हैं।

सामूहिक पूजा के बाद श्रद्धा और परंपरा के साथ इस रस्म को निभाया जाता है।

हलछठ पर्व आज भी संतान के प्रति प्रेम,रक्षा एवं मंगलकामना का प्रतीक बना हुआ है।

The Rashtra Darpan
Author: The Rashtra Darpan

द राष्ट्र दर्पण

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